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सफ़हे खोलती

सफ़हे खोलती पढ़ती सिसकती और रात भर जाग कर थक हार कर सो जाती । मेरी ज़िंदगी की दराज़ तुम्हारे खतों के बगैर मानो बेवा सी हो जाती । तुम नहीं भी हो तो भी तुम्हारे भेजे खत मंगलसूत्र के जैसे थे मानो किसी सिपाही की जंग से कोई खबर नहीं आयी हो फिर रोज़ाना उस मंगलसूत्र को चूमकर उसके आमद का इंतज़ार करती । तेरी याद जैसे खतों की बंजर ज़मी पर हर्फ़ों के बीज बो जाती । सफ़हे खोलती पढ़ती सिसकती रात रात भर जाग कर थक हार कर सो जाती ।

ये परिवार एक नदी

आप बिताएं हमारे संग भरी पूरी खुशहाल सदी । देहरी नहीं लांघ पाएगा संकट भूले से आ भी जाए यदि । आप मज़बूत किनारा ये परिवार एक नदी । आप है तो खुशियां है, आप है तो रौनकें हैं, आप है तो त्योंहार अच्छे लगते हैं, आप है तो संस्कार है, आप है तो तो ये परिवार है, आप है तो खिलखिलाता संसार है । आप मंत्रों की सी ताकत हो आप दोहों की सी प्रेरणा हो आप ग़ज़लों सी मस्ती हो आप भजनों की भक्ति हो आप है तो बहुएं बेटी है आप है तो मुसीबतें नींद में लेटी है । ये आपका जन्मदिन नहीं त्योंहार है । आपसे कायम सब अपनों में प्यार है ।

पहचान छीन ली #pehchaan cheen li

बारिशों में आया करती थी खुशबू मिट्टी की तुम्हारे इन संगेमरमर के पत्थरों ने मेरे कच्चे आंगन की पहचान छीन ली । बस चटाई पर पड़ते ही सो जाया करते थे मगर तुम्हारे टेलीविज़न ने बच्चों से खो खो कबड्डी की थकान छीन ली । जहां तनख्वाह से ज्यादा उधार मिलता था मगर तुम्हारी निर्मम शॉपिंग मॉल ने मेरे मोहल्ले की सब दुकान छीन ली । हर दीवाली ओ रमज़ान में घुलती थी मिठास मगर तुम्हारे पिज़्ज़ा ओ बर्गर ने मेरे गुड़ के सकरपारों की मिठास छीन ली । मनोज नायाब

Vasiyat

एक पुराना मकान कुछ पीतल के बर्तन थोड़ी सी किताबें माँ की एक बनारसी साड़ी पिताजी के हाथ का एक चांदी का ताबीज़ दीदी की भेजी हुई स्पंज वाली राखी गुल्लक में कुछ सिक्के सर्दियों के लिए एक पुरानी रज़ाई और दोस्तों की बचपन की तस्वीरें मेरी वसीयत में बस यही दौलत है ।

Ghazal

ए चांद बदली का घूंघट तो हटा ये ज़माना तुझे देखना चाहता है । तैयार हैं कैद होने को ज़ुल्फ़ों में उनकी अगरचे जाल वो फैंकना चाहता है । ये फितरत नहीं तो और क्या है सांप की पंख दे दिए फिर भी रेंगना चाहता है । ये जज़्बा इश्क़ से ही पैदा हो सकता है नायाब पत्थर पर नाखून से चित्र उकेरना चाहता है । मनोज " नायाब "

Kya bura kiya

धुंए को आग लिख दिया क्या बुरा किया पत्ते को बाग लिख दिया क्या बुरा किया । माना लिखना था नेताजी मगर हमने जो नेताजी को नाग लिख दिया क्या बुरा किया । पैंतरे उनके देख कर लिखना था चालाक हमने घाघ लिख दिया तो क्या बुरा किया । सुबूत ए वफ़ा मांगने वालों को कलंक लिखना था जो हमने दाग लिख दिया तो क्या बुरा किया । ये मुल्क किसी खानदान की जागीर तो नहीं नायाब ने बेलाग लिख दिया तो क्या बुरा किया । मनोज " नायाब "

Ub lahor ko jalna hoga ,#pulwamaattack#

   "अब लाहौर को जलना होगा " बजवाकर ताली गणतंत्र दिवस पर फिर हो जाते हो खामोश । क्यों हर साल दिखाते हमें परेड में अग्नि सुखोई और ब्रह्मोस । नरम घास के छोड़ बिछौने अब अंगारों पे चलना होगा । इधर जल रही यदि चिताएं तो उधर लाहौर भी जलना होगा । दिखलाओ अपना रौद्र रूप तुम कर दो सेना को आदेश । भले छोड़ के आ जाना उधर धड़ों को पर नर मुंडों को लाना तुम देश । बिलख रही है माँ उस बेटे की उसके चरणों में कर देना पेश । लहू नहीं आएगा दुश्मन का जब तक खुले रहेंगें विधवाओं के केश । बड़ी उम्मीदों से बांधा था मोदी जी तेरे सर पे हमने सेहरा । बिन बदले के तुम जो आये तो  मत दिखलाना अपना चेहरा । और किसी दिन बनवा देना तुम पक्की सड़कें और लंबे पुल पहले निपटा दो इन सुअरों को दिल में चुभी है गहरी सूल । है 'नायाब' सिपाही तूं कलम का अब न बैठो यूँ चुपचाप । कांप उठे सीना दुश्मन का कर शब्दों की ऐसी पदचाप । मनोज 'नायाब"