कुछ नहीं दिखता
सच कहूं तू जहां तक मुझे दिखता है । वहां तक मुझे कुछ भी नहीं दिखता है । रुक जाए तो भूले से दफ़न न करना , टूटा दिल ऊंची कीमत पर बिकता है । पहले सा टिकाऊपन नहीं रहा चीजों में इश्क़ ज्यादा दिन अब कहाँ टिकता है ।
शब्द ताकत बड़ी हुए मत न जोर से न बोल बारिश में फसलां उगे नहीं बाढ़ को मोल सोच में रखो लोच तो जिंदगी में लोचा कम होगा । लेखक एक राष्ट्रवादी कवि है ।