पीर
कोमल सरल निर्मल हृदय समझो सबकी पीर सज्जन हेतु मलमल हो जाओ दुर्जन हेतू तीर कभी कर्कट फल बन जाओ कभी दुग्ध शर्करा खीर सेवा शुश्रूषा सहायता को जो रहते सदा अधीर कभी च्यक्षु में रक्त है कभी झर झर बहता नीर
शब्द ताकत बड़ी हुए मत न जोर से न बोल बारिश में फसलां उगे नहीं बाढ़ को मोल सोच में रखो लोच तो जिंदगी में लोचा कम होगा । लेखक एक राष्ट्रवादी कवि है ।