आखिर क्यों माने ईश्वर को
आखिर क्यों माने ईश्वर को ? जरूर पढ़ें
मनोज चाण्डक "नायाब"
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आइये आज बिना किसी धार्मिक ग्रंथ अथवा पुस्तक को आधार बनाते हुए बिना किसी धर्म मज़हब की पूर्व निर्धारित मान्यताओं को केंद्र में रखते हुए एक सामान्य बुद्धि के व्यक्ति की तरह आज हम ईश्वर पर विवेचना करते हैं ।
ईश्वर है अथवा नहीं है इस विषय पर बहस सदियों से नहीं युगों युगों से होती आ रही है क्योंकि ईश्वर है इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है तो ईश्वर नहीं है इसका भी तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है । ईश्वर को प्रमाणित करने वालों के पास अपने कई तर्क है वैसे ही ईश्वर नहीं है ऐसा कहने वालों के पास भी अपने तर्क है अब प्रश्न है कि ऐसे में क्या किया जाए इसलिए मानने वाले मानें न मानने वाले न माने परंतु निर्णय लेने का यह सबसे व्यवहारिक तरीका है कि ईश्वर को मानने से क्या नुकसान है और क्या फायदे हैं इस पर विवेचना की जाए , ईश्वर की सत्ता को मानने से बीस फायदे मैं गिनवा सकता हूँ मगर कोई ईश्वर को मानने से कोई एक नुकसान मुझे गिनवा दें शायद नहीं गिनवा सकते तो फिर क्यों न ईश्वर में आस्था रखी जाए । ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखने से आपकी प्रवृति नैतिक आचरण कि ओर अधिक अग्रसर होगी आप में लोक कल्याण की भावना प्रबल होंगी ईश्वर का ध्यान करने से मन को शांत रखने में मदद मिलती है सकारात्मकता का भाव प्रबल होगा आप अकेले पड़ जाओ तो आपके एकांकीपन का सहारा मिल जाता है आप निराश हो जाओ तो आपको निराशा से निकाल कर आशा के प्रकाश की ओर ले जाता है आपको लगे कि दुनियां में आपका कोई नहीं है तो एक परिजन के रूप में मित्र के रूप में वह ईश्वर तो है सदा आपके साथ अर्थात आपके लिए मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से ईश्वर की सत्ता में विश्वास अति महत्वपूर्ण साबित हो सकता है ईश्वर को मानने से होने वाले 100 फायदे और कारण गिना सकता हूँ नुकसान कुछ होता नहीं इसलिए मैं तो कहता हूं जब ईश्वर को मानने से फायदे ही फायदे है नुकसान की कोई गुंजाइश नहीं है तो ईश्वर की सत्ता पर भरोसा ही रखना चाहिए । अब रहा प्रश्न ईश्वर को किसने देखा यह प्रश्न हमेशा ही नास्तिक प्रवृति के लोग पूछते हैं तो इसका क्या उत्तर है तो उत्तर यही है कि हर वो चीज जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न पड़े वह नही होगी ये नितांत ही कुतर्क है जिस तरह दूध में मक्खन घी सब होता है मगर दूध में ये सब दिखाई नहीं देता , तो क्या वह नहीं है , होता तो है न मगर इसको प्राप्त करने के लिए परिश्रम करना पड़ता है तब जाकर मक्खन निकलता है । हमारे स्थूल शरीर रूपी सॉफ्टवेयर में ईश्वर को समझने की योग्यता या तकनीक की भाषा में कॉम्पिटीबिलिटी ही नहीं है उसको समझने के लिए चेतना रूपी एडवांस सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है आपके कैलक्यूलेटर में जब 10 करोड़ तक ही गणना का विधान है तो चाहे जितने ही बटन दबा लो खरबों की गणना नहीं कर पाएगा तो क्या ये कहोगे की की अरब या खरब की संख्या होती ही नहीं है वैसे ही ईश्वर को जानने के लिए सूक्ष्म चित्त और चेतना रूपी एडवांस कैलक्यूलेटर और सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है मेरा मानना है कि नास्तिक अथवा विज्ञान के अति पक्षधर ईश्वर को जानने के लिए बुद्धि का सहारा लेते हैं इसीलिए वो समझ नहीं पाते जबकि ईश्वर को समझना और महसूस करना सिर्फ अंतर्मन और सूक्ष्म चेतना से ही संभव है बुद्धि का सम्बंध जड़ व स्थूल तथा सांसारिक वस्तुओं को समझने के लिए है जबकि चेतना का सम्बंध सूक्ष्म और अस्थूल को जानने के लिए है । चेतना को जगाने के लिए ध्यान चाहिए और ध्यान के लिए शांत चित्त चाहिए इसके लिए ज्ञानी व संत प्रवृति के लोग पहाड़ो में कंदराओं में जाते हैं और ध्यान साधना करते हैं उन्हें मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती न ही मंदिर की जरूरत पड़ती है मगर गृहस्थ क्या करें ऐसे में वो साधना कैसे करें वो तो पहाड़ों व गुफाओं में जा नहीं सकते ऐसे में उन्होंने अपने लिए मंदिर और मूर्तियां बना ली ताकि एकाग्रता व ध्यान में सहायता मिले । यूँ तो ईश्वर हर कण में हैं उस लिहाज से नहीं कह रहा मगर मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि मूर्ति में भगवान नहीं होते मूर्ति तो बस भगवान का ध्यान करने हेतु एक साधन और जरिया मात्र है मूर्ति हमें एकाग्रता प्रदान करती है आपके दादाजी की तस्वीर में दादाजी नहीं होते बस वह फ़ोटो सदैव आपको उनकी याद दिलाती रहती है आपको भूलने नहीं देती इसके पीछे एक और ठोस तर्क यह भी है कि वेदों में मूर्ति पूजा का कहीं कोई उल्लेख नहीं है मूर्ति को बहुत बाद में जरिया बनाया गया है । मूर्ति को पूजते पूजते हम भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं और उस मूर्ति में ईश्वर का अक्स देखने लगते हैं यह सिर्फ श्रद्धा है चेतना नहीं ।
यदि आप बिना मूर्ति के ध्यान करने की क्षमता हासिल कर लेते हैं तो आपको भी मूर्ति की आवश्यकता नहीं है ।
इसलिए मूर्ति को नष्ट करने से ईश्वर को नष्ट नहीं किया जा सकता बस प्रतीक को मिटाया जाता है मगर प्रतीक तो पुनः गढ़े जा सकते हैं मुगलों ने हजारों मंदिर और मूर्तियों को नष्ट किया तो क्या वह ईश्वर को नष्ट कर पाए नहीं कर पाए क्योंकि ईश्वर तो चेतना में है कण कण में है संसार की सारी मूर्तिया और मंदिर के नष्ट होने से भी ईश्वर को नष्ट नहीं किया जा सकता जैसे टेलीविजन तोड़ने से सिर्फ चित्र ही नष्ट होते हैं वह पात्र जो उस टेलीविजन में दिख रहे थे असल में तो नष्ट नहीं होते है ।
अंत मेरा मानना है कि ईश्वर में विश्वास इस सम्पूर्ण जगत के लिए हितकारी और अति आवश्यक है यदि ईश्वर के प्रकोप का भय नहीं होगा तो क्या होगा हर ओर पाप व्यभिचार व अराजकता फैल जाएगी । इसको ऐसे समझते हैं कि यह घोषणा कर दी जाए कि अब कल से देश में पुलिस और कानून व्यवस्था समाप्त कर दी गई हैं और न्यायालय की व्यवस्था भी हटा दी गई है अब किसी भी अपराध पर कोई दंड देने वाला नहीं है तो क्या परिणाम होगा नागरिक उद्दण्ड हो जाएंगे बेखौफ होकर अपराध करेंगें हर ओर अराजकता होगी क्योंकि कोई दंडित करने वाला है तो नहीं ।
इसलिए ईश्वर की सत्ता में विश्वास इस जगत के लिए कल्याणकारी है । सिर्फ व्यक्ति के आदर्श आचरण के लिए ही नहीं अपितु मानसिक शांति के लिए भी ।
राधे राधे ।
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