ज़िंदा है
अरे हाँ याद आया हम भी तो ज़िंदा है सांस रहते मरने के लिए थोड़े से शर्मिंदा है । चलो हम भी जीते हैं थोड़ी सांस लेते हैं मदद को हाथ बढ़ाते हैं थोड़े जज़्बात जगाते हैं चलो कुछ नारे लगात...
शब्द ताकत बड़ी हुए मत न जोर से न बोल बारिश में फसलां उगे नहीं बाढ़ को मोल सोच में रखो लोच तो जिंदगी में लोचा कम होगा । लेखक एक राष्ट्रवादी कवि है ।