शब्द ताकत बड़ी हुए
मत न जोर से न बोल
बारिश में फसलां उगे
नहीं बाढ़ को मोल
सोच में रखो लोच तो जिंदगी में लोचा कम होगा । लेखक एक राष्ट्रवादी कवि है ।
सितारों भरा आसमान sitaron bhara aasmaan
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मुठी भर वफ़ा के सितारे
चंद कतरे
मुहब्बत की चांदनी के
कुछ जज़्बाती बादल
बस कोई इतना सामान
मुझे मुहैया करवा दे
तो ज़मीन पे मैं भी
तुम्हारे लिए
सितारों भरा आसमान
बसा दूँ ।
महकते चहकते और लता की कोरों पर लहकते उपवन की शोभा बढ़ाते हैं ये पुष्प हर दिशा खुशबू फैलाते च्यक्षुओं को सहलाते हैं ये पुष्प । भ्रमर का प्रेम यही है यही तितलियों का यौवन है मधु मक्षिका करती जिनका सदा रसपान । ये जीवित अंग है प्रकृति का इनका सदा करो सम्मान कुछ टूट कर झरे पुष्प किसी के पैरों में न रौंदे जाएं उन्हें पहुंचा दें यदि योथिचित स्थान तब तक तो ठीक है , मगर स्पंदित आनंदित प्रस्फुटित पल्लवित पुष्पों को तोड़कर तुम लताओं से नोचकर तुम हथेलियों में दबोचकर तुम क्या नहीं कर देते हो वध इनका मां समान डालियों की गोद में खेलते पिता समान तने के कांधे पर इठलाते इन नन्हे पुष्पों को अलग कर देते हो उनसे कभी कभी ये मूक जानवर की बलि जैसा लगता है मुझको देवताओं के चरणों में कर देते अर्पित तो कभी लगा देते हो गुलदान में और अगले दिन फैंक देते हो किसी कूड़ेदान में कभी हार बनाकर किसी गले का कर देते नष्ट जीवन उनका कभी स्वागत द्वार पर बिंध कर नुकीले तारों से तो कभी मुंडेर पर लटका देते कभी चौखट पर झूला देते इसीलिए नहीं...
" यहाँ थूकना मना है " मेरे मोहल्ले की एक दीवार पे लिखा था, " यहाँ थूकना मना है " मन तो कर रहा था उस दीवार पे ये लिख दूँ की जाओ थूकने का हौसला रखते हो तो उन खादी वालों पे थूको जिन्होनें देश की इज्ज़त को तार तार कर दिया अपने कुकर्मों से देश को शर्म सार कर दिया । जाओ थूकने का शौक है तो उन पे थूको जिन्होनें ईमान की सफेदी को भ्रष्टाचार से मैला कर दिया । जहाँ होती थी मिठास शहद सी, नेताओ की जात ने उसे कसेला कर सिया । थूकना है तो उन पे थूको जिन्होंने कश्मीर में खून की नदियाँ बहाई जिन्होंने सोमनाथ की दीवारें ढहाई जिनको कैद के बाद भी दे दी रिहाई उन्हीं लोगो ने खोदी विश्वास की खाई इस दीवार पे थूकने से क्या होगा मेरे भाई पीठ में छुरा घोंपने वाले उन बन्दों पे थूको थाली में छेद करने वाले जयचंदों पे थूको जिन्हें दिखती नहीं हिन्द की धमक दुनियां में थूकना है तो ऐसे आँख वाले अंधों पे थूको । इस दिवार पे थूकने से क्या होगा " मनोज नायाब "
मानो चांद को पानी में उबाला जा रहा है जैसे समंदर को लोटे में डाला जा रहा है ये इश्क़ कितना मुश्किल काम है यारों सुई की नोक से हाथी निकाला जा रहा है ग़ज़ब है कि बच्चे तो अनाथ घूम रहे हैं और यहां कुत्तों को पाला जा रहा है । ऐसे कैसे आएगी सुबह तुम ही कहो अंधेरों की भर्ती उजालों को निकाला जा रहा है । वो फिर से नई कसमें खाने लगे हैं और पुराने वादों को टाला जा रहा है ।
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