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एक सिपाही

एक सिपाही जब छुट्टी पर घर को आता है बूढ़ी मां का वो दिन उत्सव सा बन जाता है  संकट की घनघोर घटाएं उमड़ घुमड़ कर आती है तब वो सर पर बच्चों के छाता सा तन जाता है

कर्मों का कागज़

अहंकार के सब पहाड़ यहां ढह गए समय के बहाव में बड़े बड़े बह गए  इक दिन तुमको भी वापस जाना होगा  वहां कर्मों का कागज़ तो दिखाना होगा छोड़ दे तू अपने बच पाने की उम्मीदें नेकी बदी की यहीं कट जाती है रसीदें उन रसीदों का मिलान भी कराना होगा वहां कर्मों का कागज़ तो दिखाना होगा

कविता पढ़

वेदना से पढ़  संवेदना से पढ़ मुस्कुराकर पढ़  खिलखिलाकर पढ़ नज़र से पढ़ नज़रिए से पढ़ प्यास में पढ़ भूख में पढ़ आकुलता में पढ़ व्याकुलता में पढ़ भय में पढ़ निर्भय हो कर पढ़ रोष में पढ़ आक्रोश में पढ़ जय में पढ़  पराजय में पढ़ तुलसी को पढ़ मीरा को पढ़ रसखान या  कबीरा को पढ़ अकेलेपन में पढ़ भीड़ में पढ़ बाहर तूफ़ां हो तो नीड़ में पढ़ विरह में पढ़ मिलन में पढ़ युद्ध में पढ़ शांति में पढ़ जब भी हृदह हो अधीर तब कोई कविता पढ़