एक सिपाही
एक सिपाही जब छुट्टी पर घर को आता है बूढ़ी मां का वो दिन उत्सव सा बन जाता है संकट की घनघोर घटाएं उमड़ घुमड़ कर आती है तब वो सर पर बच्चों के छाता सा तन जाता है
शब्द ताकत बड़ी हुए मत न जोर से न बोल बारिश में फसलां उगे नहीं बाढ़ को मोल सोच में रखो लोच तो जिंदगी में लोचा कम होगा । लेखक एक राष्ट्रवादी कवि है ।